धार जिला अस्पताल में स्वास्थ्य सुविधाएं एक बार फिर वेंटिलेटर पर आ गई हैं। कहने को तो यह 300 बेड का जिला अस्पताल है, जहां धार शहर ही नहीं बल्कि पूरे अंचल के ग्रामीण क्षेत्रों से रोज सैकड़ों गरीब मरीज इलाज की उम्मीद में आते हैं। लेकिन पिछले 9 दिनों से यहां सामान्य सोनोग्राफी पूरी तरह ठप है। कारण अस्पताल में कोई स्थाई रेडियोलॉजिस्ट नहीं है, और और जो डॉक्टर बॉन्ड (डीआरपी) पर सेवाएं दे रहे थे, उनका कार्यकाल 30 जून को समाप्त हो चुका है।

नतीजा यह है कि अस्पताल के सर्जनों द्वारा लिखी जा रही सोनोग्राफी के लिए मरीजों को भटकना पड़ रहा है। रोजाना करीब 25 से 30 मरीजों को सोनोग्राफी की सख्त जरूरत होती है, लेकिन अस्पताल में सोनोग्राफी नहीं होने के कारण इन मरीजों को निजी सेंटरों का रुख करना पड़ रहा है। जेब में पैसे न होने के बावजूद, इलाज की मजबूरी में गरीब मरीजों को 1000 से 1500 रुपए तक का अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पड़ रहा है।

महिला डॉक्टर पर ऑपरेशन थिएटर व सोनोग्राफी का दबाव

अस्पताल प्रशासन ने गर्भवती महिलाओं की सोनोग्राफी की जिम्मेदारी स्त्री रोग विशेषज्ञों को सौंप तो दी है, लेकिन यह व्यवस्था भी चरमरा गई है। महिला डॉक्टरों पर पहले से ही ओपीडी और ऑपरेशन थिएटर का दबाव रहता है। जब डॉक्टर गंभीर प्रसव या ऑपरेशन में व्यस्त होती हैं, तो सोनोग्राफी कक्ष के बाहर गर्भवती महिलाओं को घंटों इंतजार करना पड़ता है। दूर-दराज के गांवों से भूखी-प्यासी आईं गर्भवती महिलाओं के लिए यह इंतजार प्रताड़ना बन चुका है।

3 साल से स्थाई डॉक्टर नहीं, डीआरपी के भरोसे सिस्टम

2023 में रेडियोलॉजिस्ट की सेवाएं समाप्त होने के बाद से आज तक यहां स्थाई नियुक्ति नहीं हुई। स्वास्थ्य विभाग केवल अस्थाई व्यवस्थाओं से काम चला रहा है। इस साल अप्रैल में डीआरपी के तहत एक डॉक्टर मिले थे, लेकिन 30 जून को उनका कार्यकाल खत्म होते ही प्रशासन फिर हाथ पर हाथ धरे बैठ गया।

बिना सोनोग्राफी इलाज संभव नहीं, इसलिए नियम तोड़ रहे

अस्पताल के सर्जनों के अनुसार रोज करीब 25 से 30 मरीजों को सोनोग्राफी की जरूरत होती है। कई गंभीर मामलों में बिना सोनोग्राफी के बीमारी का अंदाजा लगाना और ऑपरेशन करना मुमकिन नहीं होता। वही अस्पताल प्रशासन ने ओपीडी में एक सूचना चस्पा की है। इसमें अस्पताल में किसी भी प्रकार की जांचें, सोनोग्राफी, सीटी स्कैन बाहर की लिखना प्रतिबंधित है ऐसा करने पर कार्रवाई होगी। अस्पताल प्रशासन ने कठोर नियम तो बना दिया, लेकिन डॉक्टरों को वैकल्पिक व्यवस्था नहीं दी। ऐसे में मरीजों की जान बचाने के लिए मजबूरन डॉक्टरों को नियम तोड़कर बाहर की सोनोग्राफी लिखनी पड़ रही है।

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